पटना सर्टिफिकेट घोटाला: ‘डुप्लीकेट दीदी’ ने तीन प्रमाणपत्र बनवाए, सिस्टम पर उठे सवाल

सिस्टम में सेंध: एक युवती ने तीन निवास प्रमाणपत्रों से खोली सरकारी मशीनरी की पोल

Rohit Mehta Journalist
Patna Certificate Fraud Duplicate Didi Three Residence Proofs
Patna Certificate Fraud Duplicate Didi Three Residence Proofs (Source: BBN24/Google/Social Media)
मुख्य बातें (Highlights)
  • एक युवती ने एक ही नाम और अंचल से तीन निवास प्रमाणपत्र बनवाए
  • प्रमाणपत्रों का आधार सिर्फ़ self-declaration, कोई सत्यापन नहीं
  • अफसरों ने जवाब में कहा– "हमने कुछ नहीं किया, युवती ही माहिर थी"

पटना: बिहार में कागज़ों का खेल अब मज़ाक बन चुका है। कभी ‘डॉग बाबू’ तो अब ‘डुप्लीकेट दीदी’ — ऐसा लगता है जैसे प्रमाणपत्र अब फुटकर चीज़ हो गए हैं। पटना प्रमंडल में निवास प्रमाणपत्र से जुड़ा एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें एक ही युवती के पास एक ही नाम और अंचल से तीन अलग-अलग निवास प्रमाणपत्र पाए गए।

मामला इतना अजीब था कि प्रमंडलीय आयुक्त डॉ. चंद्रशेखर सिंह के सामने खुद अधिकारी हैरान रह गए। यह घटना लोक शिकायत निवारण कार्यक्रम के दौरान प्रकाश में आई जब एक युवती ने सबूतों का पुलिंदा पेश किया।

पटना की सड़कों पर जलती दिखी पुलिस की सूमो, धमाके से पहले ऐसे बची जवानों की जान

एक ही नाम से तीन प्रमाणपत्र, एक ही अंचल से — प्रशासन हैरान, जनता परेशान

यह युवती पटना के दीदारगंज अंचल की है और दुल्हिनबाजार की चयनित शिक्षा सेवक बताई जा रही है। उसके तीनों प्रमाणपत्रों की नींव केवल “स्व-घोषणा” (self declaration) पर टिकी थी। मतलब– जो बोले वही सही।

जब जांच शुरू हुई तो अपर समाहर्ता ने चौंकाने वाली प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा– “हम निर्दोष हैं, युवती ने शपथपत्र दिया था, हमने सिर्फ़ प्रक्रिया पूरी की थी।”

UPI यूज़र्स सावधान! 1 अगस्त से बदल जाएंगे ये 5 बड़े नियम, ट्रांजैक्शन पर असर तय

अफसरों ने झाड़ा पल्ला, युवती बनी बहाना, सिस्टम फिर शर्मसार

यह मामला उसी ‘डॉग बाबू’ मामले के बाद सामने आया है, जिसमें एक कुत्ते के नाम पर निवास प्रमाणपत्र जारी हुआ था। अब सवाल यह है कि क्या प्रमाणपत्र बनाने की सरकारी प्रक्रिया एक औपचारिकता बन गई है?

जब एक ही व्यक्ति एक ही क्षेत्र से तीन प्रमाणपत्र बनवा सकता है, तो फिर “स्थानीयता” की परिभाषा ही क्या बची? और ऐसे में सरकारी भर्तियों, योजनाओं, और रियायतों में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होगी?

अधिकारीगण अब यह कहकर पल्ला झाड़ते दिख रहे हैं कि वे सिर्फ़ दस्तावेज़ों पर मुहर लगाते हैं, ज़िम्मेदारी उनकी नहीं। लेकिन जब सिस्टम ही भरोसे के काबिल न रहे, तो फिर आम जनता किस पर भरोसा करे?

Share This Article