चौठचंद्र 2025: मिथिला में क्यों होता है कलंकित चांद की पूजा? जानें रहस्य

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी पर जहां चंद्र दर्शन वर्जित है, वहीं मिथिला में यह पर्व श्रद्धा से मनाया जाता है।

Rohit Mehta Journalist
Chauth Chandra 2025 Mithila Mystery
Chauth Chandra 2025 Mithila Mystery (PC: BBN24/Social Media)

भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि को जहां गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन वर्जित माना जाता है, वहीं बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में यह पर्व आस्था और परंपरा के साथ मनाया जाता है। इसे चौठचंद्र या चौरचन कहा जाता है और इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर शाम को उगते चंद्रमा की पूजा करती हैं।

पौराणिक कथा: चंद्रमा पर क्यों लगा कलंक?

मान्यता है कि एक बार भगवान गणेश गिर पड़े थे और इस पर चंद्रमा ने उनका उपहास किया। क्रोधित होकर गणेश जी ने चंद्रमा को श्राप दिया कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की रात जो भी तुम्हें देखेगा, वह झूठे आरोप और कलंक का भागी बनेगा। इसी कारण इस दिन चंद्र दर्शन निषिद्ध है।

लेकिन मिथिला क्षेत्र में इसे कलंक मुक्ति पर्व माना जाता है। यहां लोग मानते हैं कि पूजा और अर्घ्य अर्पित करने से न केवल पाप नष्ट होते हैं, बल्कि मान-सम्मान भी बढ़ता है।

पूजा-विधि और परंपरा

  • महिलाएं दिन भर निर्जला व्रत करती हैं।
  • शाम को चंद्रदेव को फल, दही और पकवान चढ़ाए जाते हैं।
  • कुछ घरों में खीर में चांदी की अंगूठी या सिक्का डालकर पूजा की जाती है।
  • मान्यता है कि इससे परिवार निरोगी रहता है और झूठे आरोप नहीं लगते।

मिथिला और गणेश चतुर्थी का अनोखा रिश्ता

जहां सामान्यत: गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन से बचा जाता है, वहीं मिथिला में इसे विशेष आस्था से पूजा जाता है। यहां का विश्वास है कि चंद्रदेव को अर्घ्य देने से कलंक मिटता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

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