चाईबासा: झारखंड के Saranda Forest में भले ही Maoist गतिविधियों का सफाया हो रहा है, उनके बंकर और कैंप खत्म किए जा रहे हैं, मगर खतरनाक लैंडमाइन अभी भी वहां जिंदा हैं। ग्रामीणों के लिए जंगल अब माओवादियों से नहीं, बल्कि उनके पीछे छोड़े गए मौत के जाल से ज्यादा खतरनाक बन गया है। ताजा मामला बलिबा गांव के Shahu Barjo का है, जो जंगल में पत्ता तोड़ने गया और लैंडमाइन की चपेट में आ गया। उसके एक पैर ने वहीं दम तोड़ दिया, और शेष जीवन अब लाचार होकर बिस्तर पर गुजर रहा है।
लाचारी की जिंदगी, इलाज तक नसीब नहीं
Shahu Barjo का दर्द यही नहीं खत्म हुआ। इलाज की समुचित व्यवस्था न होने के कारण उसका दर्द बढ़ता जा रहा है। अब उसकी पत्नी ही घर में मरहम पट्टी करती है। ग्रामीणों का कहना है कि जंगल में कदम-कदम पर मौत बिछी है, लेकिन आजीविका के लिए वहां जाना मजबूरी है। जंगली जानवरों से डर नहीं, लेकिन लैंडमाइन ने जीना दूभर कर दिया है।
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हर साल हजारों जिंदगियों की कीमत
झारखंड ही नहीं, दुनिया भर में लैंडमाइन से हजारों लोग हर साल अपने अंग गंवा देते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 60 देशों में आज भी लगभग 10 करोड़ एंटी-पर्सनल लैंडमाइन दबी पड़ी हैं। हर साल करीब 25,000 लोग ऐसे विस्फोटों का शिकार होते हैं। युद्धों में लगाए गए ये लैंडमाइन नागरिकों की जान के सबसे बड़े दुश्मन बने हुए हैं। अगर इन्हें निष्क्रिय नहीं किया गया तो ये सौ साल तक भी सक्रिय रह सकते हैं।
नोबेल शांति पुरस्कार से जुड़ा अभियान
साल 1991 में “International Campaign to Ban Landmines (ICBL)” की शुरुआत की गई थी। इस वैश्विक अभियान की संयोजक थीं Jody Williams जिन्होंने इसके लिए नोबेल शांति पुरस्कार भी जीता। इस मुहिम का मकसद दुनिया भर में लैंडमाइन बैन कराना और सरकारों को डिमाइनिंग (Demining) यानी सुरंग हटाने के लिए आर्थिक सहयोग देना था। बावजूद इसके कई जगहों पर यह जहर अब भी जमीन में दफ्न है।
सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती
माओवादियों के खात्मे के साथ सुरक्षा बलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन लैंडमाइन को निष्क्रिय करने की है। झारखंड के Budha Pahar से लेकर सारंडा तक हर कोने में मौत छिपी है। अगर जल्द इन्हें हटाया नहीं गया तो ग्रामीणों का जंगल में जाना, उनके लिए हर दिन जंग लड़ने जैसा होगा।


