सोनपुर मेला में किराए की ‘सुनामी’! क्या व्यापारी डूब जाएंगे? किराया दिल्ली के CP से 5 गुना महंगा

इस बार एशिया के सबसे बड़े पशु मेले में रिकॉर्ड तोड़े किराए, लेकिन भीड़ नदारद—1,000 से अधिक दुकानदारों की कमाई पर संकट।

Sonepur Mela Stall Rent 30000 Per Foot Crisis
Sonepur Mela Stall Rent 30000 Per Foot Crisis (PC: BBN24/Social Media)
मुख्य बातें (Highlights)
  • सोनपुर मेला में स्टॉल किराया ₹30,000 प्रति स्क्वायर फीट तक पहुंचा
  • दिल्ली के कनॉट प्लेस से भी 5 गुना महंगा, लेकिन भीड़ बेहद कम
  • व्यापारियों में डर—“मेला समय पर बंद हुआ तो लाखों डूब जाएंगे”

सोनपुर: एशिया के सबसे बड़े और ऐतिहासिक सोनपुर मेला की चमक-दमक इस बार व्यापारियों की चिंता नहीं छुपा पा रही है।
रिकॉर्डतोड़ किराए, खाली दुकानें, और गिरती बिक्री—सब मिलकर इस मेले में हजारों व्यापारियों को घाटे के कगार पर ले आए हैं।

थियेटर मालिकों से लेकर जलेबी बेचने वालों तक, हर कोई एक ही बात कह रहा है—

“किराया आसमान पर है… पर भीड़ कहां है?”

किराया इतना महंगा कि दिल्ली का CP भी सस्ता!

स्टॉल किराया ₹30,000–33,000 प्रति फुट—दिल्ली के कनॉट प्लेस से 5 गुना ज्यादा

  • नक्खास इलाके में चोले-भटूरे की 5 फुट की जगह = ₹1.65 लाख
  • दिल्ली CP में समान जगह = ₹6,000/महीना
  • सोनपुर में प्राइम स्पॉट = ₹30,000–33,000/फुट

मेला सिर्फ 30 दिनों का होने के बावजूद, दुकानदार पूरे वर्ष का किराया बोली में चुका देते हैं।

किराया कैसे तय होता है? ठेकेदार ने बताया पूरा फॉर्मूला

मेले के कॉन्ट्रैक्टर अक्षय कुमार के अनुसार:

“इस साल नक्खास की 4 एकड़ जमीन की बोली ₹3.58 करोड़ में लगी है।
थिएटर, झूले और सर्कस जोन सबसे महंगे होते हैं।”

मेला सरकारी, रेलवे और निजी जमीन के मिश्रण पर फैलता है—और हर जगह किराया अलग।

‘₹55 लाख लगाया, अब टिकट खिड़की खाली’—थियेटर मालिक की व्यथा

न्यू इंडिया थिएटर के मालिक पप्पू बताते हैं:

“32 लाख सिर्फ जमीन का किराया दिया है। डांसर्स को एडवांस भी।
भीड़ नहीं आई तो सब डूब जाएगा। पहली बार नुकसान का डर लग रहा है।”

थिएटर 30 साल से मेला का आकर्षण रहा है, लेकिन इस बार स्थिति बदतर है।

Bihar Sonpur Mela Dancer
Bihar Sonpur Mela Dancer (PC: BBN24/Social Media)

छोटे व्यापारी भी संकट में—‘हर दिन कमाई नहीं हुई, तो खत्म’

चोले-भटूरे वाला रोहित—₹1.65 लाख किराया, भीड़ आधी

  • 5 फुट = ₹1.65 लाख
  • “भीड़ कम हो तो रोज का नुकसान,” रोहित कहते हैं, आटा बेलते हुए भी भीड़ पर नजर रखते हैं।

थिएटर और स्टॉल—भीड़ गायब, खर्चा आसमान पर

  • चुनाव देरी
  • शादी का मौसम
  • मेले की लेट शुरुआत

इन तीन कारणों से भीड़ काफी कम है।

स्वेटर बेचने वाले सूरज कहते हैं:

“₹1.5 लाख किराया दिया, पर ग्राहक नहीं हैं… कैसे निकलेंगे?”

दूसरे राज्यों से आए व्यापारी—किसी की किस्मत चमकी, किसी की धुंधली

मुरादाबाद के इरफ़ान (बिरयानी विक्रेता):

“1.5 लाख किराया दिया है। अगर भीड़ रही तो ₹3,000–5,000 रोज कमा लेंगे।
अच्छी जगह मिलने से उम्मीद है।”

लेकिन यह उम्मीद सबके लिए नहीं।

नक्खास से दूर—किराया कम, पर ग्राहक भी कम

चिड़िया बाज़ार के पास:

  • किराया = ₹10,000 प्रति फुट
  • 15 फुट का स्टॉल = ₹1.5 लाख
  • लेकिन बिक्री… लगभग शून्य

जोगीर राय (मिठाई विक्रेता):

“4 लाख खर्च किए, पर गांवों में लोग कटाई में व्यस्त—भीड़ नहीं आ रही।”

जलेबी वाला रितेश—₹3.8 लाख किराया, पर कड़ाही खाली

संगत ग्राउंड के पास:

  • 35 फुट = ₹3.8 लाख
  • “इस बार तो रोज घाटा ही घाटा है,” रितेश बोलते हैं, तेल में जलेबी डालते हुए।

क्या मेले की तारीख बढ़ने से बचेगी व्यापारियों की इज्जत-कमाई?

हर साल कमाई का मौसम होने वाला यह मेला, इस बार व्यापारियों के लिए घाटा पर्व बन गया है।
अब सभी की उम्मीद एक ही मांग पर टिकी है—

“मेला बढ़ा दिया जाए… नहीं तो हजारों व्यापारी बर्बाद हो जाएंगे।”

थियेटर मालिक पप्पू की आखिरी पंक्ति सबसे कड़वी सच्चाई कहती है:

“अगर मेला समय पर बंद हो गया… तो हम खत्म हैं।”

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