गोटमार मेले में पत्थरों की बारिश! 900 से अधिक घायल, 3 की हालत नाजुक

मध्य प्रदेश के पांढुर्णा में सदियों पुरानी गोटमार परंपरा इस बार फिर बनी खून-खराबे का कारण

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Gotmar Mela Stone Pelting 900 Injured 3 Critical
Gotmar Mela Stone Pelting 900 Injured 3 Critical (PC: BBN24/Social Media)

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के पांढुर्णा में आयोजित गोटमार मेले ने इस साल भी भयावह तस्वीर पेश की। जाम नदी किनारे शनिवार सुबह से शुरू हुई पत्थरबाजी में 900 से अधिक लोग घायल हो गए, जबकि 3 की हालत नाजुक बताई जा रही है। इनमें से गंभीर घायलों को बेहतर इलाज के लिए नागपुर रेफर किया गया।

घायलों में किसी का हाथ टूटा, किसी का पैर फ्रैक्चर हुआ, तो कई लोगों के सिर और चेहरे पर गहरी चोटें आईं।

प्रशासन की तमाम तैयारियां नाकाम

स्थानीय प्रशासन ने मेले से पहले सुरक्षा को लेकर कड़े इंतज़ाम किए थे। 700 से अधिक पुलिस जवान, 58 डॉक्टर और 200 मेडिकल स्टाफ तैनात किए गए। 6 अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र भी बनाए गए। धारा 144 लागू कर दी गई थी और ड्रोन व दूरबीन से निगरानी की जा रही थी। बावजूद इसके, पारंपरिक पत्थरबाजी का उग्र रूप रोकना संभव नहीं हो सका।

400 साल पुरानी परंपरा, अब तक 13 मौतें

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यह परंपरा करीब 400 साल पुरानी है। इतिहास गवाह है कि 2023 तक इस खेल में 13 लोगों की मौत हो चुकी है। इसके बावजूद, लोग इसे आज भी उत्साह से निभाते हैं। कई परिवार जिनके अपने इस परंपरा में जान गंवा चुके हैं, इसे शोक दिवस के रूप में याद करते हैं।

गोटमार की अनोखी शुरुआत

गोटमार युद्ध की शुरुआत जाम नदी में चंडी माता की पूजा से होती है। साबरगांव और पांढुर्णा गांव के लोग नदी के बीच गड़े पलाश के पेड़ और झंडे को लेकर भिड़ जाते हैं। परंपरा के अनुसार, साबरगांव के लोग पेड़ की रक्षा करते हैं, जबकि पांढुर्णा के लोग उस पर कब्जा जमाने की कोशिश करते हैं। इसी दौरान दोनों ओर से पत्थरों की बरसात शुरू हो जाती है।

प्रशासन के लिए हर साल चुनौती

प्रशासन हर बार इस हिंसक परंपरा को सांकेतिक रूप से मनाने की अपील करता है। साल 2001 में पत्थरों की जगह रबर की गेंदें इस्तेमाल कराने की कोशिश भी हुई, लेकिन ग्रामीणों ने परंपरा को पुराने तरीके से ही निभाया। हर साल पुलिस और प्रशासन के लिए यह बड़ी चुनौती बन जाता है।

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